मेरी एक सोच सी है वो.... जाने वो कहाँ रहती है|
कभी कभी ख्यालों मे आती है.. फिर पता नहीं कहां चली जाती है |
जब महसूस करता हूँ अच्छा लगता है.. सब अपना और सच्चा लगता है |
उसे याद करके समय थम सा जाता है...और मन उसके ख्यालों मे खो जाता है |
कभी कभी मन कुछ न बोलकर सिर्फ उसे महसूस करने को करता है |
साथ बैठ के समय बिताने का मन करता है |
बस ऐसे ही वो बोलती रही और मैं उसे सुनता रहूँ |
ऐसे ही जीवन के उन हसीं पालो को उसके साथ जीता रहूँ |
पर ये तो मेरी एक सोच है. पता नहीं कहां और कैसी होगी वो |
पता नही क्या वो भी यही सोचती है, जो मै सोचता हु |
जाने कब मैं उससे मिल पाऊंगा... और अपनी इस सोच को साकार कर पाऊंगा...
और न जाने कब मैं अपने दिल की बात उससे कह पाउँगा |
तब तक मेरी ये सोच एक सोच ही है | एक सपना है जो मेरे दिल मे ही है |

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